West Bengal: पेड़ की डाल पर बेजान मिला बंदर, गांव वाले बुलाते थे ‘हनुमान’, ढोल बजाकर किया अंतिम संस्कार

पश्चिम बंगाल के कैनिंग में भावुक कर देने वाली घटना

दक्षिण 24 परगना, पश्चिम बंगाल – पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के कैनिंग क्षेत्र से एक अत्यंत भावुक और मार्मिक घटना सामने आई है। निखरीघाटा ग्राम पंचायत के करकाटी गांव में एक बंदर की अचानक मौत हो गई, जिसे गांव वासी प्यार से ‘हनुमान’ कहकर पुकारते थे। इस घटना ने पूरे गांव को शोक में डुबो दिया और लोगों ने पूरी हिंदू धार्मिक परंपराओं के साथ उसका अंतिम संस्कार किया।

शुक्रवार सुबह पेड़ पर मिला बेजान शरीर

शुक्रवार की सुबह जब गांव के लोग अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त थे, तभी उन्होंने एक पेड़ की डाल पर हनुमान को बेजान लटका हुआ देखा। यह बंदर गांव में नियमित रूप से आता-जाता रहता था और गांव के सभी लोगों से उसका गहरा लगाव था। ग्रामीण नियमित रूप से उसे खाना-पानी देते थे और उसे अपने परिवार का सदस्य मानते थे।

जब ग्रामीणों ने हनुमान को पेड़ से नीचे उतारा और उसे आवाज देने की कोशिश की, तो उसकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। उन्होंने उसे खिलाने का भी प्रयास किया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। सभी को समझ आ गया कि हनुमान की मृत्यु हो चुकी है। इस दुखद खबर ने पूरे गांव में मातम का माहौल बना दिया।

हिंदू परंपरा के अनुसार किया गया पूर्ण अंतिम संस्कार

धार्मिक रीति-रिवाजों का पूर्ण पालन

गांव के सभी लोगों ने मिलकर हनुमान को स्थानीय श्मशान घाट तक ले जाने का निर्णय लिया। हिंदू धार्मिक शास्त्रों के अनुसार पूरी विधि से उसका अंतिम संस्कार किया गया। इस अवसर पर एक ब्राह्मण को बुलाया गया जिन्होंने सभी धार्मिक कर्मकांडों का संचालन किया।

पूरे गांव में ढोल और करताल की आवाज गूंजती रही। लोगों ने “कृष्ण नाम” का जाप करते हुए हनुमान की शव यात्रा निकाली। भारतीय संस्कृति में बंदरों को भगवान हनुमान का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इस बंदर की मृत्यु को गांव वालों ने अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण घटना के रूप में देखा।

समाधि की परंपरा

हिंदू धार्मिक परंपराओं के अनुसार, शव को जलाने के बजाय उसे विधिवत दफनाया गया। भारत के कई हिस्सों में, विशेष रूप से जब किसी पवित्र या सम्मानित प्राणी की मृत्यु होती है, तो उसे समाधि दी जाती है। यह प्रथा हिंदू संस्कारों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

गांव के निवासी ने संभाली शोक की जिम्मेदारी

गांव के निवासी मदन नस्कर ने इस शोक की पूरी जिम्मेदारी उठाई। उन्होंने घोषणा की कि वे तीन दिनों तक हिंदू शास्त्रों में वर्णित सभी नियमों और परंपराओं का कड़ाई से पालन करेंगे। मदन नस्कर ने कहा कि हनुमान की मृत्यु उनके लिए किसी परिवार के सदस्य की मृत्यु के समान है।

श्राद्ध और धार्मिक अनुष्ठान की तैयारी

तीन दिवसीय शोक अवधि

मदन नस्कर ने बताया कि वे तीन दिनों तक पूर्ण शोक मनाएंगे और सभी धार्मिक कर्मकांडों का पालन करेंगे। इस अवधि के दौरान, वे किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्यों और उत्सवों में भाग नहीं लेंगे।

श्राद्ध कर्म का आयोजन

तीन दिनों की शोक अवधि के बाद, हनुमान के लिए विधिवत श्राद्ध और अन्य धार्मिक अनुष्ठान किए जाएंगे। इसके लिए पहले से ही एक अनुभवी ब्राह्मण को बुलाया गया है जो सभी मंत्रोच्चारण और धार्मिक क्रियाओं का संचालन करेंगे।

हिंदू परंपरा में श्राद्ध कर्म अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह मृत आत्मा की शांति के लिए किया जाने वाला एक पवित्र अनुष्ठान है। गांव वालों का मानना है कि इन संस्कारों से हनुमान की आत्मा को शांति मिलेगी।

भारत में बंदरों का धार्मिक महत्व

भगवान हनुमान से संबंध

भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म में बंदरों को विशेष स्थान प्राप्त है। इन्हें भगवान हनुमान का प्रतीक माना जाता है, जो भगवान राम के परम भक्त और सहायक थे। रामायण में हनुमान जी ने लंका पर विजय प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

भारत के कई गांवों और शहरों में बंदरों को पूजनीय माना जाता है। लोग उन्हें खाना खिलाते हैं, उनकी देखभाल करते हैं और उन्हें नुकसान पहुंचाने से बचते हैं। बंदरों की मृत्यु को अशुभ माना जाता है और कई स्थानों पर उनका अंतिम संस्कार धार्मिक विधि-विधान के साथ किया जाता है।

देश के अन्य हिस्सों में समान परंपराएं

यह पहला मामला नहीं है जब भारत में किसी बंदर का पूर्ण धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ अंतिम संस्कार किया गया हो। मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के दरावरी गांव में 2024 में हजारों लोगों ने एक बंदर के अंतिम संस्कार में भाग लिया था। राजस्थान के अलवर जिले में भी 2022 में एक बंदर का भव्य अंतिम संस्कार किया गया था।

मानवता और करुणा की अनोखी मिसाल

पूरे गांव की एकजुटता

करकाटी गांव के लोगों ने जिस तरह से एकजुट होकर हनुमान की मृत्यु पर शोक व्यक्त किया और पूर्ण सम्मान के साथ उसका अंतिम संस्कार किया, वह मानवता और करुणा की एक अद्भुत मिसाल है। यह घटना दर्शाती है कि ग्रामीण भारत में आज भी परंपराएं, धर्म और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता कितनी गहराई से जुड़ी हुई है।

पशु-प्रेम की भावना

यह घटना पशु-प्रेम और पर्यावरण संरक्षण के प्रति ग्रामीण समुदाय की गहरी प्रतिबद्धता को भी दर्शाती है। गांव के लोगों ने हनुमान को केवल एक जानवर के रूप में नहीं, बल्कि अपने परिवार के सदस्य के रूप में देखा और उसी भावना के साथ उसका अंतिम संस्कार किया।

निष्कर्ष

पश्चिम बंगाल के इस छोटे से गांव की यह घटना पूरे देश के लिए प्रेरणादायक है। यह दिखाता है कि कैसे भारतीय संस्कृति में सभी जीवों के प्रति सम्मान और करुणा की भावना आज भी जीवित है। करकाटी गांव के लोगों ने अपने व्यवहार से यह संदेश दिया है कि धर्म और परंपराएं केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये सभी जीवों के प्रति समान आदर और सम्मान की शिक्षा देती हैं।

हनुमान की मृत्यु भले ही दुखद हो, लेकिन गांव वालों द्वारा दिखाई गई संवेदनशीलता और मानवता निश्चित रूप से सराहनीय है।


मुख्य बिंदु:

  • दक्षिण 24 परगना के करकाटी गांव में बंदर की मौत
  • पेड़ की डाल पर मिला बेजान शरीर
  • पूर्ण हिंदू रीति-रिवाजों से अंतिम संस्कार
  • ढोल-करताल के साथ शव यात्रा
  • तीन दिवसीय शोक अवधि की घोषणा
  • श्राद्ध और धार्मिक अनुष्ठान की तैयारी
  • मानवता और करुणा की अनोखी मिसाल

स्थान: निखरीघाटा ग्राम पंचायत, करकाटी गांव, कैनिंग, दक्षिण 24 परगना, पश्चिम बंगाल

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