1. परिचय
देश में आवारा कुत्तों की संख्या, डॉग-बाइट मामलों और रेबीज से होने वाली मौतों के आंकड़े इस समय सार्वजनिक स्वास्थ्य का बहुत बड़ा संकट बनते जा रहे हैं। केवल 2024 में ही लगभग 37.17 लाख डॉग-बाइट केस दर्ज हुए, जिनमें से 5.19 लाख से ज़्यादा पीड़ित 15 साल से छोटे बच्चे थे। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (12 अगस्त 2025) को दिल्ली-NCR में आवारा कुत्तों को 8 सप्ताह के भीतर शेल्टर होम में भेजने और नसबंदी-टीकाकरण कराने का निर्देश जारी किया। आइए इस व्यापक समस्या की गहराई और प्रभाव को विस्तार से समझते हैं।
(स्रोत: aajtak.in, economictimes.indiatimes.com, reuters.com, apnews.com)
2. देश में आंकड़े: भयावह परिदृश्य
- डॉग-बाइट के मामले:
2024 में देशभर में 37.17 लाख से अधिक डॉग-बाइट घटनाएं हुईं। - बच्चों पर प्रभाव:
इनमें से 5.19 लाख से अधिक पीड़ित 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे हैं। - रेबीज से मौतें:
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, 2024 में 54 संदिग्ध मानव रेबीज मौतें दर्ज हुईं। हालांकि WHO के अनुसार वास्तविक संख्या 18,000–20,000 तक हो सकती है। - दिल्ली-NCR का हाल:
दिल्ली-NCR में हर दिन औसतन 2,000 डॉग-बाइट घटनाएं होती हैं। 2025 की पहली छमाही में 35,198 दर्ज मामले सामने आए।
सारांश आंकड़े टेबल:
| घटक | आंकड़ा (2024 / 2025) |
|---|---|
| डॉग-बाइट मामले | ~37.17 लाख |
| 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे | ~5.19 लाख |
| संदिग्ध रेबीज मौतें | 54 (सरकारी), अनुमानित 18–20 हजार (WHO) |
| दिल्ली-NCR (दैनिक/पहली छमाही) | ~2,000 रोजाना / 35,198 केस — जन–जून 2025 |
3. सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: क्या, कैसे और क्यों?
3.1 आदेश की पृष्ठभूमि
सुप्रीम कोर्ट ने यह कदम स्वतः संज्ञान (suo moto) लेकर उठाया, मीडिया रिपोर्ट्स और जनहित याचिकाओं पर आधारित चिंता जताते हुए।
3.2 कोर्ट के निर्देश
- स्थानांतरण व रोक:
दिल्ली-NCR के सभी आवारा कुत्तों को आठ सप्ताह में शेल्टर होम में स्थानांतरित किया जाए, जहाँ नसबंदी और टीकाकरण होगा; उन्हें सड़कों पर वापस नहीं छोड़ा जाएगा। - हेल्पलाइन व्यवस्था:
एक सप्ताह के भीतर डॉग-बाइट शिकायतों के लिए हेल्पलाइन शुरू की जाए। - ABC नियमों की समीक्षा:
कोर्ट ने वर्तमान पद्धति—जहाँ नसबंदी के बाद कुत्तों को वापस छोड़ा जाता है—को अव्यावहारिक बताते हुए बदलाव की मांग की। - कानूनी कार्यवाही की चेतावनी:
आदेश में बाधा डालने वालों पर अवमानना कार्रवाई होगी।
3.3 विरोध और आलोचना
- पशु अधिकार कार्यकर्ता:
कुछ समूहों ने इस आदेश को अमानवीय बताया और बड़े पैमाने पर नसबंदी-टीकाकरण व जनजागरूकता पर जोर दिया। - ABC कार्यक्रम की सीमाएँ:
दिल्ली में आधे से भी कम आवारा कुत्तों की नसबंदी हुई है, जिससे आबादी नियंत्रण में विफलता साफ है।
4. समस्या की जड़: क्यों बेकाबू हो रही है स्थिति?
4.1 कानून व व्यवहार में अंतर
2001 का कानून आवारा कुत्तों को मारने से रोकता है, लेकिन पर्याप्त संसाधनों के अभाव में यह नियम जनस्वास्थ्य चुनौती बन चुका है।
4.2 पर्यावरणीय बदलाव
वल्चर आबादी में कमी के कारण कुत्तों को मृत पशुओं तक अधिक पहुंच मिली, जिससे उनकी संख्या बढ़ी।
4.3 धीमा ABC कार्यक्रम
नसबंदी व टीकाकरण की गति धीमी है, जिससे आबादी नियंत्रण नहीं हो पा रहा।
4.4 सार्वजनिक जागरूकता की कमी
लोग कुत्तों को खिलाते हैं लेकिन उनके टीकाकरण या आबादी नियंत्रण पर ध्यान नहीं देते।
5. आगे की राह: क्या समाधान है?
5.1 व्यापक टीकाकरण और नसबंदी
- राष्ट्रीय स्तर पर ABC कार्यक्रम का कड़ाई से पालन।
- मोबाइल नसबंदी/टीकाकरण यूनिट्स का विस्तार।
5.2 जनजागरूकता अभियान
- लोगों को रेबीज के खतरे और रोकथाम के बारे में जागरूक करना।
5.3 आधारभूत संरचना निर्माण
- राष्ट्रीय कुत्ता जनगणना।
- सभी राज्यों में पर्याप्त ABC केंद्र और शेल्टर होम।
5.4 कानूनी और प्रशासनिक सुधार
- स्थानीय निकायों की जवाबदेही तय करना।
- हेल्पलाइन और त्वरित कार्रवाई तंत्र बनाना।
5.5 संतुलित नीति
- मानव सुरक्षा और पशु कल्याण दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना।
6. निष्कर्ष
भारत में आवारा कुत्तों का संकट अब सिर्फ़ पशु अधिकार या कानून का मुद्दा नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य, नीति और समाज का सामूहिक संकट है। 37 लाख डॉग-बाइट, हजारों मौतें, और बच्चों पर बढ़ता खतरा—यह चेतावनी है कि अब त्वरित और ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश एक अहम कदम है, लेकिन यह तभी कारगर होगा जब इसे सख्ती, पारदर्शिता और दीर्घकालिक रणनीति के साथ लागू किया जाए। सरकार, समाज और पशु कल्याण संगठनों की साझेदारी ही इस समस्या का स्थायी समाधान ला सकती है।






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